शनिवार, 16 मई 2009

ख़त तुम्हारा


ख़त तुम्हारा आज भी दर्द लाया है
बाद मरने के खबर बेदर्द लाया है
तुम्हारी खामोशी का नया ज्वाज़ एक लेकर
दिल--शकिसटा और आहें सर्ड लाया है
कहो अब सदमात का हिसाब कैसे हो
चाँद ,रातों का बेकल वर्द लाया है
दीवानगी खुद द्वाँ की चाह कर बैठी
दरमान फिर कोइ नइई सेरहद लाया है
गर मोहब्बत ख़ाता होती खुदा नही होती
मजाज़ खुद हक़ीक़त के गर्ड लाया है
वहशत लाई है चमन से सेहरा तक
तुझ तक मसीहा मेरा अहद लाया है
विसल दाएँ एक अनोखा रंग माँगे है
होश शेर्त तहरी है,इश्क़ जहद लाया है
खुदी खुद से निकल कर जुब मिली उस से
देखा वही था अज़ल,वही आबाद लाया है
वाबस्ता रहे जिस से रुस्ते ज़ख़्म ये सारे
"चाँद"वही दर्द,मेरा हुंदर्ड लाया है

4 टिप्‍पणियां:

  1. intezar ab bhi yoon hi hai salaamat,
    hai guzraa zamaana khabar aate aate ,

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  2. zindgi ka duja naam hi intizaar hai..warna mayusion may dil doob jaate hain..so isey salamat rakhna chahiye..

    chaand

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  3. khudaa kare aapka hauslaa yoon hi banaa rahe-
    ghalib bhi keh gaye hain -

    agar aur jeete rahte yahee intezaar hota

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  4. ji ye hausla besh baha hai..jo mil gaya hai..shukur khuda ka..ghalib door-ras they..jo ye keh gaye.

    chaand

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