Wednesday, August 12, 2009

या-रब ये कौनसी मंज़िल है



या-रब ये कौनसी मंज़िल है
ख़याल कहीं,कहीं दिल है
एक शहर, जो कभी अपना था
अब यादों मे शामिल है
कोई ज़मीन कहाँ चुनता है
बस हस्ती का अपनी क़ाएल है
ख्वाब होश के दुश्मन हैं
खीर्ड फिर भी उनपेर माएल है
क्या फ़र्क़ एमआरत और बे-दर का
तेरे आयेज हेर कोइ साएल है
मुमताज़ जो इंसान को करती है
वो शाए कुछ और नही दिल है
छूँड लम्हे जो हाथ आए हैं
यही समझो तो माता-ए-कुल है
एक आँसू जो किसी का चुन लो तुम
बरज़ाक़ पेर भारी वो झिलमिल है
हेर आँख उम्मीद का मरकज़ है
एक क़दम की दूरी पेर साहिल है
हेर होनी का वक़्त मुआईं है

साक़ि ने माए-काशी


साक़ि ने माए-काशी का
हसीन गर सीखा दिया
कुछ होश जो आया तो
फिर जलवा दिखा दिया
जाम-ओ-सबु से घरज़
दीवानों को ना सही
अपने महबूब के दर्र को
माए-खाना बना दिया
मस्त-ए-घूम जो थे
उन्हें प्याला थमा दिया
साक़ि को प्यास ने
सैर होना सीखा दिया
आए नाबरेड आज़मा-ए-वक़्त
तुझे क्या क्या बना दिया

सहेमी सहेमी शामें हैं



सहेमी सहेमी शामें हैं
कैसे उजड़े उजड़े दिन हैं
पतझड़ के मोसां हैं
गुलशन के अपने घूम हैं
वही दिन साल साड़ियाँ हैं
सवाल करती नदियाँ हैं
सेहरा सेहरा बहती हैं
नज़ाने क्या कहती हैं
किनारों का मूह ताकते
खामोश साहिल दरया हैं
पेड़ों की उजड़ी शाखें जैसे
बेघर पंछी का गिरया हैं
बदल भी चुप रहते हैं
दर्द सबा के सहते हैं
दुनिया एक फसाना है
मंज़र सारे कहते हैं