Saturday, February 2, 2013

मैने फिर आज तुम्हें देखा









मैने फिर आज तुम्हें देखा
मैने आज फिर से तुम्हें चाहा
जैसे कोई ख़याल रूबरू होजाए
जैसे कोई अक्स हूबहू नज़र आए
ऐसे तुमसा कोई जुब सामने आजाए
काश फिर से कोई ख्वाब होजाए
मई उस लम्हे कू गिरफ़्त मे ले लूँ
तुम्हें एक बार नज़र से छू लूँ
किसी पल मुझे भी होश आजाए
जुब सामने तुमसा कोई आजाए
वो घड़ी यक़ीन की सूरत ले ले
पहचान के साए उसको टटोले
दूं भर कू उजाला होजाए
जुब सामने तुमसा कोई आजाए
एक यही रिश्ता निभा है हम से
ये दिल कूब छुपा है तुम से
ये एक दूं से तुम्हारा आना
एक नज़र-ए-करम का मिल जाना
सौ दर्र शिफा के खोले
एक नज़र तुम्हारी जुब बोले
मेरे दर्द डोर हुए अब सारे
एक तुम्हारी अन्स के आगे सब हारे
मई ने हार के सब जुग पाया
तुम्हें पाना ही मुझे रास आया
मई मँनूं हूँ उलफत तेरी
तूने लाज उलफत की रखी है मेरी
जुब भी कोई घूम ने मुझे सताया
तू एक नये रूप मे सामने आया
तू ले जाता है मुझ से मुझ को
हेर दूं मई पास रखूँगी तुझ को

No comments:

Post a Comment