शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

वो रक़स जुनून जो कर ना सका






ये ख्वाब नही है मानो तो
ये पऔन वही हैं देखो तो
वो रक़स जुनून जो कर ना सका
एक क़दम थी इश्क़ की मँज़ी भी
पेर क्या कीजिए इस पागलपन का
जो पल मे किसी का हो ना सका
सौ बार धड़कते दिल ने कहा
हो ना हो यही है ख्वाब तेरा
जसरत फिर भी खामोश रही
आख़िर इस दिल ने क्या क्या ना सहा
पेर इतने बरसों मे ज़ालिम का
हेर  लम्हा  एक  पघाम रहा
खुद बाज़ रहा मुलाक़ातों से
उस दर्द ने मेरा हेर दर्द छुआ
वो जानता था,ये एक बचपन है
जो प्यारा था उस से प्यार हुआ
इल्ज़ाम सभी उस ने सर अपने लिए
कहीं अपना बाक़ी कुछ ना रखा
दिल उसी को  माँगे, मुराद नही

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