गुरुवार, 17 नवंबर 2011

अजब खुसबु है मोहब्बत ये....


लोग कहते हैं
सराब है ये धोका है
मगर मई ये कहती हूँ
ये खुद को पाने का मौक़ा है
शब-ए-घूम का ये शबनमी आँसू
ये वीरान दिलों की है खुश्बू
ये है तन्हा सुलगता अंगारा
ये सियाह रातों का लश्कारा
खामोशी मे जैसे कोई सरगोशी
रूह मे उतेर जाए एक सुई सी
ये दिल वालों का मज़हब है
ये दीवानों का मानसब है
क्या कहीं कोइ दिल सवाली है
क्या कहीं कोइ दामन खाली है
जिस दिल मे ये समा जाए
वो दिल हेर दिल को महकाय
मोहब्बत क्या क्या ना समझाए
महबूब के संग मेराज तक पाए

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