शनिवार, 23 मई 2009

कोइ बाज़म-ए-ख़याल फिर सजे


कोइ बाज़म--ख़याल फिर सजे
कोइ समान--घूम तो हो
कोइ जूसतजू फिर दिल की करे
कोइ उम्मीद मुबहाँ तो हो
कोइ सताए फिर आकर हुमें
कोइ दर्द फिर कूम तो हो
कोइ हासिल--दीवानगी ना नही
कोइ सिला मेरे हुंदम तो हो
कोइ शुमार अख़्तर क्या करे
कोइ शब ऐसी सनम तो हो
कोइ जुनून जागे फिर ख्वाब से
कोइ ऐसा हसीन सितम तो हो
कोइ घड़ी ज़ीस्ट सी भी लगे
कोइ लम्हा चाँद करम तो हो

शुक्रवार, 22 मई 2009

चाहा था


चाहा था बहुत चाहतों को हम आम करेंगे
दुनिया याद रखे ऐसे कुछ काम करेंगे
कहाँ जानते थे, के यही है फरमान--खुदा
अपने ही दिल का मातम सुबा शाम करेंगे
ये सच नही के यहाँ प्यार मोहब्बत की कमी है
जहाँ हो नूवर--मोहब्बत,वहाँ शैतान क़ायम करेंगे
बरसों से भटकती इस प्यासी रूह का समान
सरकार की एक नज़र का हासिल जाम करेंगे
खुद की तलाश में गर मिल गया खुदा
तुम्हारी ही रहबरी में सफ़र तमाम करेंगे
तुम्हारी मिलगाई, मिल जाएगी सरकार की निगाह
हक़ मोहब्बत का अदा हम हेर गाम करेंगे

आए ताज


आए ताज तुझे जिसने भी बनाया होगा
अपने महबूब से नज़र चुराया होगा
मायूस निगाहों में महेबूब की उसको
अक्स ताज का ही नज़र आया होगा
गर मुमताज़ थी मोहब्बत उस की
खुद को ताज पे खड़ा पाया होगा
शाहों ने यह कैसी मोहब्बत की थी
आहों से सुंग भी गरमाया होगा
थी अदा--मोहब्बत के घुरूर--शहान
इश्क़ भी खुद से गब्राया होगा
हेर दर्द कहेगा आए शाह--जहाँ
ताज ने चाँद का दर्द सजाया होगा

बुधवार, 20 मई 2009

एक रोज़ का तमाशा


एक रोज़ का तमाशा
जीवन की हर खुशी है
हर साँस आती जाती
क्यों बोझ सी बनी है
क्या यही ज़िंदगी है
जज़्बात वो कहाँ हैं
बहकी तीन आरज़ुएँ
हालात वो कहाँ हैं
तू भी मुझ से नलान
मुझ मे ना ढाल सका
क्यों हुस्न--इश्क़ ज़िंदगी का
मुझ को ना मिल सका
जज़्बा जहद का
कहाँ जेया के सो गया
जुनून फ़ैसलों का
क्यों एक लख्त खो गया
इस दीवानगी को यारो
तुम कोई नाम दे दो
टिशणा काविशों को
"चाँद"का प्याम दे दो

सुन्नट्ता



एक सेहरा है खामोश सा
एक सुन्नट्ता है बे-तूफान
एक साकिन सा साहिल है
क्या यह मेरा दिल है
कभी यह भी धड़कता था
कितने रु-पहले अरमान लिए
वक़्त सा जो घाएल है
क्या ये मेरा दिल है
कब से क़ाफ़िले बहारों के
आए भी और चले गये
राहों मे जो साएल है
क्या ये मेरा दिल है
तक़दीर लम्हों का खेल सही
कुछ तो मिला इस से भी
एक मोहब्बत जो कामिल है
क्या ये मेरा दिल है