सोमवार, 2 नवंबर 2009

उम्र कुछ इस तरहा


उम्र कुछ इस तरहा
हुई बसर अपनी
ना थी किसी की खबर
ना रही खबर अपनी
अजब दिल के मोसां थे
अजब थी डगर अपनी
अपनी ज़िंदगी कूब थी
सब की रहिी मगर अपनी
वक़्त के तक़ाज़ों पेर
कहाँ हुई गुज़र अपनी
अजब मोक़ं है आशिक़ी
वहीं होगआइइ बसर अपनी
होते बे-खुदी के क़ाएल
होती खुदी अगर अपनी
जिसके आयेज जुख गया दिल
उसी ने की क़दर अपनी
मैकश और माएकहने
उनमे कहाँ लेहायर अपनी
कहाँ अब हुंसे दीवाने
कहाँ पाई सब ने नज़र अपनी

चेहरे अक्स रूहों का


चेहरे अक्स रूहों का

अक्सर हुआ नही करते

गर हाक़ेक़त साँझ लेते
चेहरों पेर नही मरते

बुधवार, 12 अगस्त 2009

या-रब ये कौनसी मंज़िल है



या-रब ये कौनसी मंज़िल है
ख़याल कहीं,कहीं दिल है
एक शहर, जो कभी अपना था
अब यादों मे शामिल है
कोई ज़मीन कहाँ चुनता है
बस हस्ती का अपनी क़ाएल है
ख्वाब होश के दुश्मन हैं
खीर्ड फिर भी उनपेर माएल है
क्या फ़र्क़ एमआरत और बे-दर का
तेरे आयेज हेर कोइ साएल है
मुमताज़ जो इंसान को करती है
वो शाए कुछ और नही दिल है
छूँड लम्हे जो हाथ आए हैं
यही समझो तो माता-ए-कुल है
एक आँसू जो किसी का चुन लो तुम
बरज़ाक़ पेर भारी वो झिलमिल है
हेर आँख उम्मीद का मरकज़ है
एक क़दम की दूरी पेर साहिल है
हेर होनी का वक़्त मुआईं है

साक़ि ने माए-काशी


साक़ि ने माए-काशी का
हसीन गर सीखा दिया
कुछ होश जो आया तो
फिर जलवा दिखा दिया
जाम-ओ-सबु से घरज़
दीवानों को ना सही
अपने महबूब के दर्र को
माए-खाना बना दिया
मस्त-ए-घूम जो थे
उन्हें प्याला थमा दिया
साक़ि को प्यास ने
सैर होना सीखा दिया
आए नाबरेड आज़मा-ए-वक़्त
तुझे क्या क्या बना दिया

सहेमी सहेमी शामें हैं



सहेमी सहेमी शामें हैं
कैसे उजड़े उजड़े दिन हैं
पतझड़ के मोसां हैं
गुलशन के अपने घूम हैं
वही दिन साल साड़ियाँ हैं
सवाल करती नदियाँ हैं
सेहरा सेहरा बहती हैं
नज़ाने क्या कहती हैं
किनारों का मूह ताकते
खामोश साहिल दरया हैं
पेड़ों की उजड़ी शाखें जैसे
बेघर पंछी का गिरया हैं
बदल भी चुप रहते हैं
दर्द सबा के सहते हैं
दुनिया एक फसाना है
मंज़र सारे कहते हैं

बुधवार, 27 मई 2009

मेरा परिचाए



दोस्तो…….मेरा परिचाए केवल इतना ही, मई एक गुमशुदा नहर (केनाल) थी आप सब मे शामिल होकर दर्याफ़्त होगआई….ये खुदा की ही मेर्ज़ी थी के उन दिलों को क़लम थमा दिया जाए जिनसे उसे अपनी वाणी सुनने सुनाना चाहता था..और उनके लिए एक रहनमुआ भी भेजा उसने…दर्द से बड़ा रहनुमा और कोइ कहाँ…सो दर्द को हवा डेडी गई…और क़लम खुद खुदा कहता गया…दर्द मोहब्बत मे बहता गया…बस यह रही मेरी मेरे क़लम की दास्तान,तारूफ़ …मुझे उम्मीद है के मज़ीद तारूफ़ की कोइ ज़रूरत नही होगी…के क़लांकार समाज की डरोहर होता है..आप सब ने अपना बनाया मेहेरबानी आपकी….खुश रहें…

रहना चाँद

मंगलवार, 26 मई 2009

आना के महल



आना के महल दिल की ज़मीन पेर
क़ायम ना रह सकेंगे यक़ीन कर
सोच की लकीर हूँ तेरी जबीन पेर
तुझ से कब जुड़ा हूँ यक़ीन कर
सब कुछ मिला है हम-नशीन पेर
फिर भी कोई कमी है यक़ीन कर
सफ़र हक़ीक़तों का सदा था टाईं पेर
राह भटका गया रहबार यक़ीन कर
हेर वक़्त है नज़र अपने मकीन पेर
है"चाँद" इशारे का मुंतज़ार यक़ीन कर