गुरुवार, 17 नवंबर 2011
अजब खुसबु है मोहब्बत ये....
लोग कहते हैं
सराब है ये धोका है
मगर मई ये कहती हूँ
ये खुद को पाने का मौक़ा है
शब-ए-घूम का ये शबनमी आँसू
ये वीरान दिलों की है खुश्बू
ये है तन्हा सुलगता अंगारा
ये सियाह रातों का लश्कारा
खामोशी मे जैसे कोई सरगोशी
रूह मे उतेर जाए एक सुई सी
ये दिल वालों का मज़हब है
ये दीवानों का मानसब है
क्या कहीं कोइ दिल सवाली है
क्या कहीं कोइ दामन खाली है
जिस दिल मे ये समा जाए
वो दिल हेर दिल को महकाय
मोहब्बत क्या क्या ना समझाए
महबूब के संग मेराज तक पाए
सोमवार, 14 मार्च 2011
ये मेरी चाहतों को.............

ये मेरी चाहतों को
आज क्या हुआ है
कुछ सोचना भी चाहूं
ज़हन क्यों सूना पड़ा है
वो ख़याल क्या हुआ
जहाँ तू आ बसा था
वो दिल कहाँ गया
जो तुझ से जेया मिला था
दर्द की हेर गली
आज वीरान पड़ी है
ज़िंदगी फिर से कोइ
सवाल लिए खड़ी है
कौन हूँ मई आख़िर
क्या चाहती हूँ ज़िंदगी से
ये कस्माकश कह रही है
ये पहचाहन की एक कड़ी है
कूब ख़तम खेल होगा
कूब कोई सिरा मिलेगा
मई उसको थाम लूँगी
फिर तुझ से आ मिलूंगी
शाएेद वही है मेरी मंज़िल
क़दम तेरे थाम लूँगी
चुपके से तेरा नाम लूँगी
रविवार, 13 मार्च 2011
एक दिन और डूबा है.....
एक दिन और डूबा है
एक सूरज फिर निकलेगा
कहीं शाम कोई ढाल जाएगी
कहीं रात कोई साज जाएगी
तकती आँखों की उम्मीदों का
कोइ दिया रोशन कर आएगा
देख कातिब बार वक़्त कोई
करम किसी पेर कर जाएगा
एक मासूम की आहों से
ये आलम दहल ना जाए
कहीं कोई सिसकी चुपके से
तेरे दर्र से ना आ टकराए
काँप उठेगा ज़ररा ज़ररा ये
जुब तक़दूस पे कोइ आँच आए
उस वक़्त से दर आए ज़ालिम वक़्त
जुब खुदा की तुझ से तन जाए
बहतेर है रोक ले खुद को तूऊ
शाएेद बात किसी की बन जाए
छोड़ दे अपनी ये ख़याली सरदारी
कोइ तक़दीर से ना लड़ पाए
जिस का जितना मोक़दार है
उतना ही उसके हाथ आए
शुक्रवार, 21 जनवरी 2011
फ़ैसला
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