मंगलवार, 25 मई 2010

यहाँ हेर कोई चतान है


आए ज़िंदगी अब तुझ मे

वो बात ही कहाँ है

अब आए आसमान तुझ मे

कहाँ कोई कहकशां है

आए उदास रात तुझ मे

कोई कार्ब नीं जान है

इस सारा-सींगी के पीछे

कोइ खामोश सा तूफान है

था जहाँ किरदारों का मेला

अब कहाँ वो दास्तान है

हेर मुस्कुराहट के पीछे

कोई घरज़ हुक्मरान है

इन लकड़िओन के घरों मे

अब कहाँ कोई मकान है

देख मोसमों की बेवफ़ाइ

हवा कूब से परेशन है

है हेर सुबह माचीनों सी

ज़िंदगी अब ना-मेहेरबान है

शामों को तो ढालना है

वक़्त भला रुकता कहाँ है

एक मई ही पथराई नही हूँ

यहाँ हेर कोई चतान है

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

रुत है रहमातों की




रुत है रहमातों की
मोसां है बख़्शिशों का
कोई लम्हा फ़ैज़ का
बस मिल जाने को है
वो सुर्ख रंग मोसां
फिर से आने को है
फिर रंग उसके दिल का
रंग लाने को है
कोई मुसलसल कह रहा है
तू सदा मेरा रहा है
किसी ज़मीन आसमान मे
तेरे यक़ीन,तेरे गुमान मे
एक मूभम ख़याल बन कर
मुझ मे छुपा हुआ है
वही दोस्त का मर्तबा है
वही आज़मात-ए-दुआ है

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

मुझे राह दिखा के तुम


मुझे राह दिखा के तुम

ना छोड़ देना राह मे

तुम्हारी राह ना सही

मेरी राह तुम्ही से है

मई कूब से दरम्यान

खड़ी हूँ इंतिज़ार मे

तुम्हारा साथ ना सही

हेर बात तुम्ही से है

तुम्हारे सफ़र से ही हुई

इस सफ़र-ए-ना-तमाम की िबतिडा

शौक़-ए-मंज़िल ना सही

ये दिल तुम्ही से है

तमाशा जो बने रहे

एहसास जाने कहाँ गये

अपना पत्ता ना सही

ये आटा तुम्ही से है

घूम अब किस का करें

वजह समझे थे जिसे

उसका निशान ना सही

अपना निशान तुम्ही से है

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

तस्वीर तेरी जुब भी




तस्वीर तेरी जुब भी
निगाहों मे आगाई
ये खाना-ए-दिल जैसे
बक़ा-ए-नूवर होगआया
जैसे कहीं कोइ शोला
बुझ कर तुउर होगआया
कहीं कोइ बट गिरा
गिर कर छुउर होगआया
मेरा वजूद तेरी हस्ती
तू मेरा सुरूर होगआया
जिसने भी निगाह डाली
वो मास-हूर होगआया

शनिवार, 30 जनवरी 2010

कहीं किसी शहर मे



कहीं किसी शहर मे

फिर किसी के घर मे

कोइ हसरतों का मारा

आज मार गया होगा

दिलों के भेद सारे

जान लेते हैं सितारे

खुद अपनी ही चाल से

कोइ दर गया होगा

ये दो आँखें देखो

कितने ख्वाब देखती हैं

किसी का इनसे गुज़र कर

वक़्त तहेर गया होगा

कहीं नफ़स ब्राहना है

कहीं आरज़ू सर्घना है

आसान है शिकार होना

शिकार कर गया होगा

उसे मर्घुब चाहतें हैं

बे-बस की शिकाएतें हैं

उसका अब भी वही ठिकाना

वहीं वो फिर गया होगा

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

ये भी एक दौर है



ये भी एक दौर है
ये भी गुज़र जाएगा
ये मस्त खरमाण वक़्त
अपनी चाल बदल जाएगा
इस जिस्म का हेर अंसार
क़तरा क़तरा पिघल जाएगा
बे-ख्वाब इन रातों से
हेर ख्वाब निकल जाएगा
ज़िंदगी एक मुसाफिर का क़ूबा
मुसाफिर चोला बदल जाएगा
रंग बदलते चेहरों का
एक और रंग ढाल जाएगा
ज़ख़्म पुराने कहते हैं
नया हेर दर्द बहाल जाएगा
अभी मई एक हक़ीक़त हूँ
मुझ पेर भी ये कल आएगा

ये बेखुदी कह रही है



ये बेखुदी कह रही है
ये बे-सबब नही है
कोइ दुश्मन होश का है
कोइ होश अब नही है
दीवाना दिल कह रहा है
दीवाना ये कूब नही है
खर्ड का अब क्या करोगे
खीर्ड गर सब नही है
दुनिया से क्या दिल लगाना
दुनिया अपनी जुब नही है
कल का ख्वाब,ख्वाब है
कल गर कोई शब नही है
हेर साँस कस्माकश है
हेर तरफ तू जुब नही है