गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

तस्वीर तेरी जुब भी




तस्वीर तेरी जुब भी
निगाहों मे आगाई
ये खाना-ए-दिल जैसे
बक़ा-ए-नूवर होगआया
जैसे कहीं कोइ शोला
बुझ कर तुउर होगआया
कहीं कोइ बट गिरा
गिर कर छुउर होगआया
मेरा वजूद तेरी हस्ती
तू मेरा सुरूर होगआया
जिसने भी निगाह डाली
वो मास-हूर होगआया

शनिवार, 30 जनवरी 2010

कहीं किसी शहर मे



कहीं किसी शहर मे

फिर किसी के घर मे

कोइ हसरतों का मारा

आज मार गया होगा

दिलों के भेद सारे

जान लेते हैं सितारे

खुद अपनी ही चाल से

कोइ दर गया होगा

ये दो आँखें देखो

कितने ख्वाब देखती हैं

किसी का इनसे गुज़र कर

वक़्त तहेर गया होगा

कहीं नफ़स ब्राहना है

कहीं आरज़ू सर्घना है

आसान है शिकार होना

शिकार कर गया होगा

उसे मर्घुब चाहतें हैं

बे-बस की शिकाएतें हैं

उसका अब भी वही ठिकाना

वहीं वो फिर गया होगा

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

ये भी एक दौर है



ये भी एक दौर है
ये भी गुज़र जाएगा
ये मस्त खरमाण वक़्त
अपनी चाल बदल जाएगा
इस जिस्म का हेर अंसार
क़तरा क़तरा पिघल जाएगा
बे-ख्वाब इन रातों से
हेर ख्वाब निकल जाएगा
ज़िंदगी एक मुसाफिर का क़ूबा
मुसाफिर चोला बदल जाएगा
रंग बदलते चेहरों का
एक और रंग ढाल जाएगा
ज़ख़्म पुराने कहते हैं
नया हेर दर्द बहाल जाएगा
अभी मई एक हक़ीक़त हूँ
मुझ पेर भी ये कल आएगा

ये बेखुदी कह रही है



ये बेखुदी कह रही है
ये बे-सबब नही है
कोइ दुश्मन होश का है
कोइ होश अब नही है
दीवाना दिल कह रहा है
दीवाना ये कूब नही है
खर्ड का अब क्या करोगे
खीर्ड गर सब नही है
दुनिया से क्या दिल लगाना
दुनिया अपनी जुब नही है
कल का ख्वाब,ख्वाब है
कल गर कोई शब नही है
हेर साँस कस्माकश है
हेर तरफ तू जुब नही है

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

या सदा थी एक ख़याल की




या सदा थी एक ख़याल की
एक ख़याल की थी िबतिडा
ख़याल ही ख़याल मे
तराश लिया एक दिलरुबा
अब ज़माने से क्या कहूँ
ख़याल को तू कैसे मिला
राज़-ए-हक़ जानता नही कोई
इज़हार उसी से हुआ बरमाला
मई इश्क़ की सूरत हूँ ज़रूर
मई हूँ नियतों का सिला
मेरा अक्स तेरा ख़याल है
तेरा दिल होगा मेरी सदा
क़ासिद हूँ तेरा प्याम हूँ
तेरा लफ्ज़ लफ्ज़ मेरी दुआ
अजीब दास्तान है ये ज़िंदगी
हेर आरज़ू मे खुदा मिला
जुब रूबरू-ए-ख़याल होगआय
फिर कोइ पेरडा ना रहा
आईं क़ुद्रट के रुक्ण का
मेरा सुखन है एक सिलसिला

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

आए घूम-ए-बे-करां


आए घूम-ए-बे-करां

तू कहाँ नही,कहाँ नही
ना हो परेशान मेरी गाज़ल
नज़्म ना बिगड़ जाए कहीं
ज़ब्त-ओ-जज़्ब का ही रिवाज हो
फिर कहीं जज़बों की मेराज हो
एक मौक़ा होजाए गर आटा
फिर ख़याल पालेटा है खुदा
आए उदास रत्त तेरी क़सम
मैने भुला दिए रंज-ओ-घूम
इन्ही मे खुशी के राज़ हैं
सोज़-ओ-साज़ एक ही अंदाज़ हैं
कभी गुज़रो किसी दर्द की शाम से
देखना होज़ाएँगे दर्द अपने आम से
सदिओं से ज़िंदगी का यही है चलन
ये कभी खार है कभी चमन
मई कहीं नहीं,तू है कू बा कू
मालिक रहे तेरा करम और मेरी “हू’

ये रात का फुसून है


ये रात का फुसून है के
उदास शाम का क़ुसूर है
ये दिल की बात है दिलरुबा
कहीं तेरा ख़याल ज़रूर है
तू मोक़ं है मई हाल हूँ
मेरा कैफ़ तेरा शऊर है
मई अभी महू-ए-ख़याल हूँ
तू साहेब-ए-हुज़ूर है
मई एक भटकती शमा
तू दयार-ए-नूवर है
मेरी रोशणिओन का राज़ तू
तेरे दम से मेरा ज़हूर है
सब ने बस देखा तुझे
दुनिया का ये ही दस्तूर है
नज़ाने क्यों है यक़ीन
तेरे भेस मे कोई और है
हाला हूँ मई है चाँद तू
तू ही मेरा घुरूर है